Sunday, 30 April 2017

देश में वन सुरक्षा की चुनौतियाँ

           भारत विभिन्न प्रकार के वनों के साथ दुनिया में अत्यधिक विविधता वाले देशों में से एक है। देश का 20 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वन क्षेत्र में है। राष्ट्रीय वन नीति (1988) का लक्ष्य भारत में वन क्षेत्र को कुल क्षेत्र के एक तिहाई तक लेकर आना है। 2015 में जारी भारत राज्य वन रिपोर्ट के मुताबिक, 2013-2015 के बीच कुल वन क्षेत्र में 5081 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है, जिससे की 103 मिलियन टन कार्बन सिंक की बढ़त दर्ज़ की गई है।

           मिजोरम में सबसे अधिक 93 प्रतिशत वन क्षेत्र है, कई उत्तर पूर्वी राज्यों में हरित आवरण में गिरावट दर्ज़ है। वनों की सुरक्षा और विकास के लिए देश को अपनी नीतियों को लागू करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।   भारत में जंगलों का संरक्षण वन संरक्षण अधिनियम (1980) के कार्यान्वयन और संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना के माध्यम से किया जाता है। भारत सरकार ने 597 संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की है जिनमें से 95 राष्ट्रीय उद्यान और 500 वन्यजीव अभयारण्य हैं। उपरोक्त क्षेत्र देश के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 5 प्रतिशत हैं।

             विभिन्न प्रकार के वन और जंगली झाड़ियाँ बाघ, हाथियों और शेरों सहित विभिन्न वन्य जीवों की मेजबानी करते हैं। बढ़ती जनसंख्‍या के कारण वन आधारित उद्योगों एवं कृषि के विस्तार के लिए किये जाने वाले अतिक्रमण की वजह से वन भूमि पर भारी दबाव है। पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के निर्माण के लिए वन संरक्षण और विकास परियोजना के पथांतरण के बीच बढ़ते संघर्ष वन संसाधनों के प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

             देश में  लकड़ी की मांग तेजी से बढ़ रही है। 2005 में 58 मिलियन क्यूबिक मीटर से बढ़कर 2020 में 153 मिलियन क्यूबिक मीटर हो गई है। वन भण्डार की वार्षिक वृद्धि केवल 70 मिलियन क्यूबिक मीटर की लकड़ी की आपूर्ति ही कर सकती है, जिससे हमें अन्य देशों से कठोर लकड़ी आयात करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। भारत में 67 प्रतिशत ग्रामीण परिवार घर का खाना पकाने के लिए जलाने की लकड़ी पर निर्भर करते हैं। जलाने वाली लकड़ी से निकलने वाले धुएं से सालाना लगभग 10 लाख लोगों की मृत्यु की सूचना प्राप्त होती है।

           समस्या को हल करने के लिए, प्रधानमंत्री एलपीजी स्कीम 'उज्ज्वला योजना' को पेट्रोलियम और गैस मंत्रालय द्वारा लागू किया गया है जो कि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित बीपीएल परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन प्रदान करता है। इसने ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में परिवारों तक साफ और कुशल ऊर्जा पहुंचाई है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने 'वन और ऊर्जा' थीम पर 2017 में विश्व वन दिवस मनाने का आह्वान किया है। इसका मुख्य लक्ष्य लकड़ी को अक्षय ऊर्जा के प्रमुख स्रोत के रूप में विकसित करना, जलवायु परिवर्तन की रोकथाम करना और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देना है। 

           सामुदायिक लकड़ी संग्रहों को विकसित करने के साथ स्वच्छ और ऊर्जा कुशल लकड़ी के स्टोव उपलब्ध करवा कर, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में लाखों लोगों को अक्षय ऊर्जा की सस्ती और विश्वसनीय आपूर्ति उपलब्ध कराई जा सकती है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन के स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री के अनुसार "देश में दो प्रमुख वनीकरण योजनाएं हैं, एक तो राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम (एनएपी) और दूसरी ग्रीन इंडिया राष्ट्रीय मिशन (जीआईएम)। इन दोनों ही योजनाओं को संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम के तहत सहभागिता स्वरुप में लागू किया गया है।" एनएपी का उद्देश्य अवक्रमित वनों का पर्यावरण से जुड़ा उत्थान करना और जीआईएम का लक्ष्य वनों की गुणवत्ता में सुधार करने के साथ-साथ खेत और कृषि वानिकी सम्बंधित वनों को बढ़ाना है। 

            जीआईएम के तहत प्रतिवर्ष छह मिलियन हेक्टेयर अवक्रमित वन भूमि पर वृक्षारोपण किया जाना है। विकास उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाई गई वन भूमि को पुनः वनीकृत करना वनीकरण के मुख्य स्तंभों में से एक है। संसद के दोनों सदनों ने 2016 में वनीकरण क्षतिपूर्ति विधेयक को पारित कर दिया है। 42,000 करोड़ रुपयों के प्रावधान के साथ देश में वन संसाधनों के संरक्षण, सुधार और विस्तार हेतु राज्यों को 6000 करोड़ रुपये का वार्षिक परिव्यय उपलब्ध कराया जाएगा। यह अधिनियम वनीकरण क्षतिपूर्ति कार्यक्रम को लागू करने के लिए केंद्र और राज्य दोनों ही स्तरों पर संस्थागत ढांचा उपलब्ध कराता है। 

            इसके अतिरिक्त यह लगभग 15 करोड़ दिवसों का प्रत्यक्ष रोज़गार उत्पन्न करेगा, जो देश के दूरदराज के वन क्षेत्रों में जनजातीय आबादी की सहायता भी करेगा। इन हरित योजनाओं को लागू करने में भारत को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन रोपे गए पौधों के अस्तित्व को सीधे तरीके से प्रभावित करता है। शुष्क क्षेत्रों एवं रेगिस्तान का विस्तार एक अन्य बड़ी चुनौती है जिसका उचित हस्तक्षेप द्वारा सामना करना एक प्रमुख आवश्यकता है। वनीकरण के लिए एक सहभागिता मॉडल की अत्यंत आवश्यकता है। आदिवासी ज्ञान प्रणालियों की ताकत को पहचानते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, "अगर कोई है जिन्होंने जंगलों की रक्षा की है, तो वह हमारा आदिवासी समुदाय है, उनके लिए जंगलों की रक्षा आदिवासी संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा है।"

              उन्होंने लोगों का आह्वान कर उनसे प्रतिज्ञा करने को कहा कि वे सामूहिक रूप से वनों के संरक्षण और वृक्ष आवरण को बढ़ाने की तरफ कार्य करें। अधिक वन का मतलब जल की अधिक उपलब्‍धता, जो किसानों और भविष्य की पीढ़ियों के लिए लाभप्रद होगा। प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार ऋषि-मुनि एवं अन्य विद्यान व्यक्ति वन से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। रबींद्रनाथ टैगोर के अनुसार, वन पर आधारित जीवनशैली सांस्कृतिक विकास का उच्चतम स्वरूप है। ऋषि-मुनि वन में वृक्षों एवं पानी की धाराओं के पास रहते हुए उनसे बौद्धिक और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करते थे। यद्यपि संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन ने अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस का मुख्य विषय 'वन से प्राप्त होने वाली लकड़ी ऊर्जा’ को बनाया है।

             भारतीय परंपरा वनों की जीवित ऊर्जा को अत्यंत महत्वपूर्ण दर्ज़ा और मूल्य प्रदान करती है, जो जीवन के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जनन को प्राप्त करने में सहयोगी होती है। यह वनों और ऊर्जा के बीच के संबंधों को समझने का एक अधिक समग्र दृष्टिकोण लगता है।

Saturday, 22 April 2017

मनरेगा में 2.82 करोड़ की परिसंपत्तियां सृजित

              महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम ने एक करोड़ परिसंपत्तियों को भू-चिन्हित करते हुए एक नई उपलब्धि हासिल की। 

      मनरेगा के अंतर्ग‍त सृजित परिसंपत्तियों का आकार अत्‍यन्‍त विशाल हो चुका है। वित्‍तीय वर्ष 2006-07 में प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम के अंतर्गत अब तक करीब 2.82 करोड़ रुपये मूल्य की परिसंपत्तियां सृजित की जा चुकी हैं। इसके अंतर्गत हर वर्ष औसतन करीब 30 लाख परिसंपत्तियों का निर्माण किया जाता है, जिनमें अनेक कार्य शामिल होते हैं, जैसे जल संरक्षण ढांचों का निर्माण, वृक्षारोपण, ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का सृजन, बाढ़ नियंत्रण के उपाय, स्‍थायी आजीविका के लिए व्‍यक्तिगत परिसंपत्तियों का निर्माण, सामुदायिक ढांचा और ऐसी ही अन्‍य परिसंपत्तियां शामिल होती हैं। 

             मनरेगा परिसं‍पत्तियों को भू-चिन्हित यानी जिआ-टैग करने की प्रक्रिया जारी है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सृजित सभी परिसंपत्तियां जिआ-टैग की जाएंगी। राष्‍ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन कार्यों, विशेष रूप से जल संबंधी कार्यों को भू-चिन्हित यानी जिआ-टैग करने पर विशेष ध्‍यान केन्द्रित किया जा रहा है। जिआ-मनरेगा ग्रामीण विकास मंत्रालय का एक बेजोड़ प्रयास है, जिसे राष्‍ट्रीय दूर संवेदी केन्‍द्र (एनआरएससी), इसरो और राष्‍ट्रीय सुचना विज्ञान केन्‍द्र के सहयोग से अंजाम दिया जा रहा है। इसके लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 24 जून 2016 को एनआरएससी के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर किए थे। इसके अंतर्गत प्रत्‍येक ग्राम पंचायत के अंतर्गत सृजित परिसंपत्तियों को जिओ-टैग किया जाना है।

            इस समझौते के फलस्‍वरूप राष्‍ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्‍थान की सहायता से देशभर में 2.76 लाख कार्मिकों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया। उम्‍मीद की जा रही है कि भू-चिन्हित करने की प्रकिया से फीड स्‍तर पर जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी।

देश के 91 प्रमुख जलाशयों के जलस्तर में कमी 

              देश के 91 प्रमुख जलाशयों में 46.06 बीसीएम (अरब घन मीटर) जल का संग्रहण आंका गया। यह इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 29 प्रतिशत है। 13 अप्रैल को समाप्त हुए सप्ताह के अंत में यह दर 31 प्रतिशत थी। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के कुल संग्रहण का 133 प्रतिशत तथा पिछले दस वर्षों के औसत जल संग्रहण का 106 प्रतिशत है। 

           इन 91 जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 157.799 बीसीएम है, जो समग्र रूप से देश की अनुमानित कुल जल संग्रहण क्षमता 253.388 बीसीएम का लगभग 62 प्रतिशत है। इन 91 जलाशयों में से 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली संबंधी लाभ देते हैं। उत्तरी क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, पंजाब तथा राजस्थान आते हैं। इस क्षेत्र में 18.01 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले छह जलाशय हैं, जो केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्यूसी) की निगरानी में हैं। 

             इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 4.50 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 25 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 22 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 30 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है, लेकिन पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से यह कमतर है।

               पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा आते हैं। इस क्षेत्र में 18.83 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 15 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 8.68 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 46 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 32 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 32 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है। 

               पश्चिमी क्षेत्र में गुजरात तथा महाराष्ट्र आते हैं। इस क्षेत्र में 27.07 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 27 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 9.81 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 36 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 19 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 35 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।

              मध्य क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ आते हैं। इस क्षेत्र में 42.30 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 12 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 17.43 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 41 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 29 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 26 प्रतिशत था। इस तरह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में चालू वर्ष में संग्रहण बेहतर है। यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी बेहतर है।

               दक्षिणी क्षेत्र में आंध्र प्रदेश (एपी), तेलंगाना (टीजी), एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु आते हैं। इस क्षेत्र में 51.59 बीसीएम की कुल संग्रहण क्षमता वाले 31 जलाशय हैं, जो सीडब्ल्यूसी की निगरानी में हैं। इन जलाशयों में कुल उपलब्ध संग्रहण 5.61 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 11 प्रतिशत है। पिछले वर्ष की इसी अवधि में इन जलाशयों की संग्रहण स्थिति 14 प्रतिशत थी। पिछले दस वर्षों का औसत संग्रहण इसी अवधि में इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का 26 प्रतिशत था। इस तरह चालू वर्ष में संग्रहण पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुए संग्रहण से कमतर है, और यह पिछले दस वर्षों की इसी अवधि के दौरान रहे औसत संग्रहण से भी कमतर है। 

         पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में जिन राज्यों में जल संग्रहण बेहतर है उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश,  उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, एपी एवं टीजी (दोनों राज्यों में दो संयुक्त परियोजनाएं), और तेलंगाना शामिल हैं। इसी अवधि के लिए पिछले साल की तुलना में कम संग्रहण करने वाले राज्यों में हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं।

Friday, 24 March 2017

मनरेगा : ग्रामीण परिवारों की जीवनरेखा

           महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने अपनी स्थापना के बाद से अब तक एक लंबा सफर तय कर लिया है। यह लाखों लोगों के लिए एक जीवनरेखा बन गया है।

            इस अधिनियम को 7 सितंबर 2005 को अधिसूचित किया गया था ताकि प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वर्ष में कम से कम 100 दिन का रोजगार प्रदान किया जा सके, जिनके वयस्क सदस्य अकुशल दस्‍ती काम कर सकते थे। सामाजिक समावेश, लिंग समानता, सामाजिक सुरक्षा और न्यायसंगत विकास महात्मा गांधी नरेगा के संस्थापक स्तंभ हैं। वर्ष 2015-16 के दौरान, 235 करोड़ दिवस पैदा किए गए, जोकि पिछले पांच वर्षों की तुलना में सबसे ज्‍यादा था। वर्ष 2016-17 के दौरान 4.8 करोड़ परिवारों को 142.64 लाख कार्य-क्षेत्रों में रोजगार दिए गए।

             इस प्रक्रिया में रोजगार के 200 करोड़ दिवस पैदा किए गए। कुल रोजगार का 56 प्रतिशत हिस्‍सा महिलाओं के लिए पैदा किया गया। इस कार्यक्रम की शुरुआत के बाद से अब तक महिलाओं की यह भागीदारी सबसे ज्‍यादा है। इस कार्यक्रम के लिए अब तक 3,76,546 करोड़ रुपए दिए गए हैं। वित्‍त वर्ष 2017-18 के लिए 48,000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं, जोकि मनरेगा के लिए अभी तक आवंटित राशियों में सबसे अधिक है। वर्ष 2016-17 में 51,902 करोड़ रुपए खर्च किए गए जोकि इसकी शुरुआत के बाद से अब तक का सबसे अधिक खर्च है। औसतन हर साल (वित्‍त वर्ष 2013-14 तक) 25 से 30 लाख कार्य पूरे किए गए थे, वहीं मौजूदा वित्‍त वर्ष 2016-17 में 51.3 लाख काम पूरे किए गए।

             इस कार्यक्रम की शुरुआत के बाद पहली बार, जल संरक्षण के लिए समेकित दिशानिर्देश तैयार किए गए। मिशन जल संरक्षण - प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) और इंटीग्रेटेड वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम (आईडब्ल्यूएमपी) के साथ मिलकर मनरेगा के तहत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) संबंधित कार्यों के लिए योजना और निगरानी फ्रेमवर्क तैयार किया गया है। इनके लिए वैज्ञानिक नियोजन और नवीनतम प्रौद्योगिकी का उपयोग करके जल प्रबंधन का निष्पादन ही मंत्रालय का मुख्‍य ध्‍येय है। वित्‍त वर्ष 2016-17 में कुल खर्च का 63 प्रतिशत हिस्‍सा एनआरएम (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन) कार्यों पर खर्च किए गए। वित्‍त वर्ष 2016-17 में कृषि और संबंधित क्षेत्रों के कार्यों पर लगभग 70 प्रतिशत खर्च किया गया, जोकि वित्‍त वर्ष 2013-14 में सिर्फ लगभग 48 प्रतिशत था। भू-मनरेगा तो एक पथप्रदर्शक पहल है, जो बेहतर नियोजन, प्रभावी निगरानी, बढ़ी हुई दृश्यता और अधिक पारदर्शिता के लिए मनरेगा के तहत बनाई गई सभी संपत्तियों को भू-टैगिंग के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करती है। 

              इस पहल की शुरुआत वित्‍त वर्ष 2016-17 में की गई। लगभग 65 लाख संपत्तियों को भू-टैग किया गया। इसे पब्लिक डोमेन में लाया गया। निधि प्रवाह तंत्र के बेरोकटोक चलने और मजदूरी के भुगतान में देरी को कम करने के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 21 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम (एनईएफएमएस) लागू किया है। इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम (ईएफएमएस) के द्वारा एमजीएनआरईजीए के कर्मचारियों के बैंक/डाकघर खातों में मजदूरी का लगभग 96 प्रतिशत हिस्‍सा इलेक्ट्रॉनिक रूप से भुगतान किया जा रहा है। 

              वित्त वर्ष 2013-14 में मजदूरी का सिर्फ 37 प्रतिशत भुगतान इलेक्ट्रॉनिक रूप से किया गया था। अभी 8.9 करोड़ सक्रिय मजदूरों के एनआरईजीएसोफ्ट-एमआईएस में आधार संख्या दर्ज है, जबकि जनवरी 2014 में यह संख्या मात्र 76 लाख थी। अब तक 4.25 करोड़ मजदूरों को आधार आधारित भुगतान प्रणाली (एबीपीएस) के लिए सक्षम किया गया है। वित्‍त वर्ष 2016-17 के दौरान जॉब कार्ड सत्‍यापन और अद्यतन प्रक्रिया शुरू की गई थी। अभियान के रूप में चलाकर 75 प्रतिशत सक्रिय जॉब कार्डों का सत्‍यापन किया गया। वर्ष 2016-17 के लिए पहले जारी किए गए 1039 परिपत्रों/परामर्शों और वार्षिक मास्टर परिपत्र (एएमसी) जारी करके मनरेगा को सरल बनाने के लिए पहल की गई। वित्‍त वर्ष 2017-18 के लिए एएमसी जारी किया जाएगा। 

                 ग्राम पंचायत स्तर पर रजिस्टरों की संख्या में कमी करने के लिए औसतन 22 रजिस्टरों की तुलना में 7 सरल रजिस्टरों की प्रक्रिया लागू की गई है। अब तक, 2.05 लाख ग्राम पंचायतों ने इसे अपना लिया है। यह कार्यक्रम सामाजिक ऑडिट और आंतरिक लेखा परीक्षा की एक अधिक स्वतंत्र और सशक्त प्रणाली की दिशा में आगे बढ़ रहा है, ताकि महिला एसएचजी से लिए गए सामाजिक लेखा परीक्षकों के एक प्रशिक्षित सामुदायिक काडरों के द्वारा जवाबदेही के साथ-सा‍थ विकास भी सुनिश्चित किया जा सके। मंत्रालय ने अंतरराज्‍यीय आदान-प्रदान कार्यक्रम की शुरुआत की है, जिससे विचारों और पद्धतियों को साझा किया जा सके। 2016-17 के दौरान अब तक, तमिलनाडु, राजस्थान, मेघालय, झारखंड, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों ने इस पहल को लागू किया है। 

           पहली बार, बुनियादी स्‍तर पर पीएमजीएसवाई दिशानिर्देशों के आधार पर गैर-पीएमजीएसवाई सड़कों के लिए दिशानिर्देश बनाए गए हैं। इन संपत्तियों के भविष्‍य में पीएमजीएसवाई मानकों के स्‍तर तक की गुणवत्‍ता की संभावना होगी।

Wednesday, 8 March 2017

महिलाएं परिवर्तन की वाहक

           राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर नारी शक्ति पुरुस्कार प्रदान किए। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है।

            भारत में हम अपने दैनिक जीवन में अनेक तरीकों से अपनी महिलाओं को स्वीकार करते है। याद करते है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हम समाज के प्रति महिलाओं के निःस्वार्थ उपहार के लिए उन्हें विश्व द्वारा नमन करने में शामिल हो रहे है। नारी शक्ति पुरुस्कार प्राप्त करने वाली महिलाओं और संगठनों को बधाई देता हूं। उन्होंने चुनौतियों को स्वीकार करके तथा उच्च आकांक्षाओं को पूरा करने का उत्कृष्ठ कार्य किया है। प्रत्येक सफलता के पीछे संकल्प और दृढ़ता की कहानी होती है। 

          प्रत्येक सफलता हजारों अन्य महिलाओं के प्रयासों का प्रतिनिधित्व करती है। इनका समान रूप से आदार किया जाना चाहिए। भारत के स्वतंत्र गणराज्य बनने से पहले अपने देश में महिलाओं की सशक्तिकरण पर विचार-विमर्श शुरू हुआ। हमारे संविधान और नीति निर्देशक तत्वों में नीति और नियोजन के लिए सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए है। महिलाएं अब केवल कल्याण लाभों को प्राप्त करने वाली नहीं बल्कि समान अधिकार, समान सहभागी और देश की सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक प्रक्रियाओं में परिवर्तन की वाहक के रूप में मान्य दी जाती हैं। 

            राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं का प्रयास सराहनीय रहा है। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक असमानता को कम करने में प्रभावी रूप से योगदान दिया है। निःस्वार्थ भाव से विकास तथा राष्ट्र निर्माण के लक्ष्यों के लिए कार्य कर रही है। स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में ग्रामीण भारत में एक मिलियन से अधिक, निर्धारित 33 प्रतिशत से अधिक- महिलाओं ने अधिकार प्राप्त किए हैं। प्रभावी रूप से अपने दायित्व को निभा रही हैं। रक्षा सेवाओं, पुलिस तथा सुरक्षा बलों, खेल, शिक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और नवाचार जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में महिलाएं कमजोर और शोषित लोगों के लिए काम कर रही हैं, समुदाय तक पहुंच रही है। 

           स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भागीदारी कर रही हैं। अच्छे टीम कार्य और सफलता के लिए महिलाएं अपरिहार्य हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रायः महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि महिलाएं ऐसी कठिनाइय़ों को पार कर जाती है और प्रेरित करती हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर यह दोहराना आवश्यक है कि प्रत्येक लड़की और महिला को यह आवश्स्त किया जाना चाहिए कि भारत सरकार उन्हें ऐसा सक्षम वातावरण उपलब्ध कराने के लिए संकल्पबद्ध है, जिसमें उन्हें को बराबरी का अवसर मिले। महिलाओं को आत्मविश्वासी महसूस होना चाहिए, उन्हें यह विश्वास होना चाहिए कि जिस क्षेत्र को वह चुनती हैं उन क्षेत्रों में वह उच्च आकांक्षाओं की पूर्ति कर सकती है। 

             देश के अनेक हिस्सों में बाल लिंग अनुपात में गिरावट को देखते हुए प्रधानमंत्री का ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान लांच किया गया है। यह अभियान इस तरह बनाया गया है ताकि देश के प्रत्येक हिस्सें में लड़की प्राथमिक शिक्षा में नामांकन के लिए प्रेरित हो सके। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 2015 तक देश के 100 जिलों को चुना गया। 2016 में इसमें 61 अतिरिक्त जिले जोड़े गए। सरकार महिलाओं के प्रति बढ़ रही हिंसा को लेकर चिंतित है। यह अक्षमय बात है कि भारत में महिला उतनी सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, जितनी सुरक्षा होनी चाहिए।  

               राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा, आधुनिक भारत में लैंगिंक असमानता और भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। भारत का प्रमुख लक्ष्य समावेशी विकास है। इस बारे में स्कूलों और कॉलेजों में बच्चों को संवेदी बनाने से महिलाओं को उचित सम्मान मिलेगा। यह कार्य हमारे ग्रामीण और शहरी आबादी के बीच उचित उपायों के जरिए और समेकित सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से पूरा किया जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि महिलाओं में अनेक कार्य संपन्न करने की आपार क्षमता होती है। अपने परिवारों तथा घरों से लेकर खेतों, व्यवसायों और विभिन्न कार्यों में महिलाओं का संकल्प किसी से कम नहीं है। गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की कृति घरे बायरे में पढ़ी हुई पंक्ति मुझे याद आती है कि, ‘हम महिलाएं घर के चिराग की केवल देवियां नहीं, बल्कि इसकी ज्योति और आत्मा है।’ 

            महिलाओं को आदार देते समय यह पंक्तियां हमारे दिमाग में होनी चाहिए। यह कठिन नहीं है क्योंकि यह बुनियादी मूल्य हमारी महान विरासत का हिस्सा रहे हैं। हमारी चेतना में हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हमें इन बुनियादी मूल्यों की रक्षा और प्रसार के प्रति अपने आप को समर्पित करना चाहिए। इन शब्दों के साथ मैं एक बार फिर नारी शक्ति पुरुस्कार विजेताओं को बधाई देता हूं। उनके प्रयासों में सफलता की कामना करता हूं। महिला और बाल विकास मंत्री श्रीमती मेनका संजय गांधी को इन पुरुस्कारों के गठन के लिए मैं हृदय से धन्यवाद देता हूं। यह पुरुस्कार महिलाओं के सशक्तिकरण और अपने देश की प्रगति के लिए व्यक्तियों, संस्थानों और संगठनों को छोटा-बड़ा योगदान करने के लिए प्रेरित करेगे।

Monday, 6 March 2017

महिला सशक्तिकरण, मुक्ति व समानता महत्वपूर्ण

            सूचना व प्रसारण मंत्री वैंकेया नायडू ने कहा कि देश के विकास में महिलाओँ की भूमिका को परिभाषित करने के तीन महत्वपूर्ण तत्व हैं। 

सूचना व प्रसारण मंत्री वैंकेया नायडू ने कहा कि  महिला सशक्तिकरण, मुक्ति तथा समानता। सरकार विभिन्न उपायों के जरिए महिलाओं और लड़कियों के लिए समान अधिकार और अवसर उपलब्ध कराने के प्रति संकल्पबद्ध है। साथ-साथ सूचना और प्रसारण मंत्री ने फिल्मों में महिलाओं को घिसेपीटे और पारंपरिक रूप से दिखाने पर चिंता व्यक्त की। वैंकेया नायडू तेजस्विनी धारावाही की 100वीं कड़ी पूरी होने पर दूरदर्शन समाचार द्वारा आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। 

                  इस अवसर पर सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौर भी उपस्थित थे। नायडू ने महिलाओं और लड़कियों से संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए सरकार द्वारा किए गए विभिन्न उपायों की चर्चा की। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम का उद्देश्य व्यवहार में परिवर्तन लाना और महिलाओँ की भूमिका के बारे में लोगों की सोच को बदलना है। सुकन्या समृद्धि योजना हमारी बेटियों को वित्तीय सुरक्षा उपलब्ध कराती है। प्रधानमंत्री द्वारा मन की बात के माध्यम से लाँन्च किया गया। सेल्फी विद डॉटर्स अभियान पूरे विश्व भर में फैला। यह पूरी दुनिया के टॉप 5 ट्रेंड में रहा। 

                         नायडू ने इस अवसर पर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से आई 14 तेजस्विनियों को सम्मानित किया। सूचना और प्रसारण मंत्री ने इस अवसर पर तेजस्विनी यू-ट्यूब लिंक का उद्घाटन भी किया। इस अवसर पर सूचना और प्रसारण मंत्री ने कहा कि महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देने में मीडिया को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्मों के माध्यम से नारी शक्ति कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने देश के इतिहास में योगदान करने वाले और उदाहरण पेश करने वाली महिला नेताओं और बुद्धिजीवियों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को सामाजिक स्थान पर लाने में हमारे देश ने काफी काम किया है। 

            उन्होंने कहा कि यद्यपि हम पुरानी मनोवृत्ति से और व्यवहारों से उभर आए हैं लेकिन लैंगिक समानता के बारे में लोगों को संवेदी बनाने का कार्य पूरा करना है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय महिलाओं की भूमिका और उनके योगदान दिखते हैं। भारतीय महिलाएं बैंकर, अंतरिक्ष वैज्ञानिक, पुलिस तथा कॉरपोरेट पेशे में महत्वपूर्ण नेतृत्व निभा रही हैं। सॉफ्टवेयर उद्योग का 30 प्रतिशत कार्यबल महिलाओं का है। भारतीय महिलाओं ने खेल के क्षेत्र में भी अपनी शक्ति का प्रदर्शऩ किया है। बैडमिंटन में पी.वी.सिंधु, कुश्ती में साक्षी मलिक और मुक्केबाजी में मैरी कॉम इसके उदाहरण हैं। यहां तक की वर्तमान सरकार में महिला सहयोगी, विदेश मंत्रालय, वाणिज्य तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को नेतृत्व प्रदान कर रही है। 

                   महिलाओं के असाधारण प्रयासों की चर्चा करते हुए नायडू ने कहा कि छत्तीसगढ़ की 105 वर्षीय कुँवर बाई के जोश की कहानी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। स्वच्छ भारत अभियान के शुभंकर के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा हाल में उनका सम्मान किया गया। नायडू ने कहा कि प्रसिद्ध महिलाओं की प्रेरणादायी कहानियां और उपलब्धि प्राप्त करने वाली महिलाओं के साक्षात्कार से वैसी महिलाएं प्रेरित होंगी जिनकी और ध्यान नहीं गया। उन्होंने प्रसार भारती से लड़कियाँ, किशोरियों तथा महिलाओं के लिए सरकार द्वारा चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं का संदेश फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का आग्रह किया।

                  उन्होंने कहा कि महिलाओं की योग्यता, मेधा और शक्ति को दिखाने वाले कार्यक्रम बनाने और विकसित किये जाने चाहिए। इससे देश में महिला आंदोलन सशक्त होगा। इससे पहले महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रमों की चर्चा की। श्रीमती गांधी ने विशेष रूप से समानता के विचार को प्रोत्साहित करने के लिए सोशल मीडिया पर मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया “हम समान हैं अभियान” की चर्चा की।

                सम्मानित तेजस्विनियों में सुश्री दीपा मलिक, पैरालम्पिक 2017 रजत पदक विजेता, सुश्री सुनीता चौधरी, दिल्ली की पहली ऑटो रिक्शा चालक, सुश्री गीतांजलि बब्बर, सेक्स वर्कर्स के लिए सामाजिक कार्यकर्ता, सुश्री अर्चना रामसुंदरम, अर्द्धसैनिक विंग की पहली महिला प्रमुख, पंडिता अनुराधा पाल, विश्व की पहली महिला पेशेवर तबला वादक, डॉ सोनल मानसिंह, भरतनाट्यम कलाकार, सुश्री उषा चोमर, स्वच्छता एम्बेसेडर, सुश्री प्रतिष्ठा सारस्वत, योगाचार्य, विंग कमांडर पूजा ठाकुर, सुश्री प्रज्ञा घिलडियाल, दिव्यांगता के साथ सर्वश्रेष्ठ खेल व्यक्ति, सुश्री रूपा, एसिड हमले से सुरक्षित बचीं, सुश्री मधु, एसिड हमले से सुरक्षित बचीं, सुश्री नीतू, एसिड हमले से सुरक्षित बचीं, सुश्री संतोष यादव, पर्वतारोही है।

Sunday, 5 March 2017

भारत व ग्रीस के बीच हवाई सेवा समझौता

             प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत और ग्रीस के बीच एयर सर्विसेज एग्रीमेंट (एएसए) पर हस्‍ताक्षर करने को मंजूरी दी है। 

         इस समझौते में दोनों देशों के बीच अधिक से अधिक व्‍यापार, निवेश, पर्यटन और सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्‍साहित करने की क्षमता है ताकि उन्‍हें नागरिक विमानन क्षेत्र में हुए विकास से जोड़ा जा सके। यह दोनों पक्षों की विमानन कंपनियों को वाणिज्यिक अवसर मुहैया कराते समय जबरदस्‍त सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए बेहतर एवं निर्बाध कनेक्टिविटी के अनुकूल वातावरण मुहैया कराएगा।  समझौता, दोनों देश एक या अधिक विमानन कंपनी को नामित करने के हकदार होंगे। हरेक देश की नामित विमानन कंपनी को दूसरे देश के परिक्षेत्र में अपना कार्यालय खोलने का अधिकार होगा ताकि वह अपनी हवाई सेवाओं की बिक्री को बढ़ावा दे सके। दोनों देशों की नामित विमानन कंपनियों को विनिर्दिष्‍ट मार्गों पर सहमति के साथ सेवाओं के संचालन के लिए उचित एवं समान अवसर उप्‍लब्‍ध होंगे। प्रत्‍येक पक्ष की नामित विमानन कंपनी को समान पक्ष, अन्‍य पक्ष एवं तीसरे देश की नामित विमानन कंपनियों के साथ सहायक विपणन व्‍यवस्‍था करने का अधिकार होगा।

             रूट शिड्यूल के अनुसार, भारतीय विमानन कंपनियां एथेंस, थेसालोनिकी, हेराक्‍लॉयन और बाद में निर्धारित किए जाने वाले ग्रीस के किसी तीन शहरों के लिए भारत से उड़ान भर सकेंगी। जबकि यूनानी गणराज्‍य की विमानन कंपनियां नई दिल्‍ली, मुंबई, बेंगलूरु, कोलकाता, हैदराबाद और चेन्‍नई के लिए अपनी सीधी उड़ान सेवा शुरू कर सकती हैं। 

               भारत और ग्रीस के नामित विमानन कंपनियों के लिए मध्‍यवर्ती के तौर पर कोई भी शहर उपलब्‍ध रहेगा। वर्तमान में भारत और ग्रीस के बीच कोई एयर सर्विसेज एग्रीमेंट (एएसए) नहीं है। दोनों पक्षों के प्रतिनिधिमंडलों की बैठक 6-7 सितंबर 2016 को नई दिल्‍ली में हुई थी जिसमें एएसए की सामग्रियों को अंतिम रूप दिया गया था। यह समझौता इंटरनैशनल सिविल एविएशन ऑर्गेनाइजेशन (आईसीएओ) के ताजा दिशानिर्देश के तहत है। इसमें नागरिक विमानन क्षेत्र की ताजा घटनाक्रमों को ध्‍यान में रखा गया है। इसे दोनों देशों के बीच हवाई संपर्क में सुधार लाने के उद्देश्‍य से तैयार किया गया है।